Showing posts with label कृष्ण शलभ. Show all posts
Showing posts with label कृष्ण शलभ. Show all posts

Tuesday, 31 July 2012

ओ री चिड़िया


 -कृष्ण शलभ
जहाँ कहूँ मैं, बोल, बता दे
क्या जाएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

चन्दा मामा के घर जाना
वहाँ पूछ कर इतना आना
आ करके सच-सच बतलाना
कब होगा धरती पर आना
कब जाएगी, बोल लौट कर
कब आएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

पास देख सूरज के जाना
जा कर कुछ थोड़ा सुस्ताना
दुबकी रहती धूप रात-भर
कहाँ? पूछना, मत घबराना
सूरज से किरणों का बटुआ
कब लाएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

चुन-चुन-चुन-चुन गाते गाना
पास बादलों के हो आना
हाँ, इतना पानी ले आना
उग जाए खेतों में दाना
उगा न दाना, बोल बता फिर
क्या खाएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

Friday, 24 June 2011

सूरज जी, तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो

-कृष्ण शलभ
सूरज जी,
तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!

लगता तुमको नींद न आती
और न कोई काम तुम्हें
ज़रा नहीं भाता क्या मेरा
बिस्तर पर आराम तुम्हें
ख़ुद तो जल्दी उठते ही हो‚
मुझे उठाते हो
सूरज जी ,
तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!

कब सोते हो‚ कब उठ जाते
कहाँ नहाते-धोते हो ?
तुम तैयार बताओ हमको
कैसे झटपट होते हो ?
लाते नहीं टिफ़िन‚
क्या खाना खा कर आते हो ?
सूरज जी !
तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!

रविवार आफ़िस बन्द रहता
मंगल को बाज़ार भी
कभी-कभी छुट्टी कर लेता
पापा का अख़बार भी
ये क्या बात‚
तुम्हीं बस छुट्टी नहीं मनाते हो !
सूरज जी !
तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!