Wednesday, 28 February 2018

मन के भोले-भाले बादल

झब्बर-झब्बर बालों वाले
गुब्बारे से गालों वाले
लगे दौड़ने आसमान में
गुब्बारे से काले बादल

कुछ जोकर-से तोंद फुलाए
कुछ हाथी-से सूँड़ उठाए
कुछ ऊँटों-से कूबड़ वाले
कुछ परियों-से पंख लगाए
आपस में टकराते रह-रह
शेरों से मतवाले बादल

कुछ तो लगते हैं तूफ़ानी
कुछ रह-रह करते शैतानी
कुछ अपने थैलों से चुपके
रह-रह-रह बरसाते पानी
नहीं किसी की सुनते कुछ भी
ढोलक-ढोल बजाते बादल

रह-रहकर छत पर आ जाते
फिर चुपके ऊपर उड़ जाते
कभी-कभी जि़द्दी बन करके
बाढ़ नदी-नालों में लाते
फिर भी लगते बहुत भले हैं
मन के भोले-भाले बादल


-कल्पनाथ सिंह



Wednesday, 14 February 2018

मिट्ठू और मिंकू

राम चरित मानस
पढ़ता था
दिन में मिट्ठू तोता
लेकिन सुबक सुबक कर मिट्ठू
रात रात भर रोता

मिंकू
विद्यालय से लौटा
खेल रहा फ़ुटबाल
मिट्ठू की पिंजरे में केवल
तीन कदम की चाल

मिंकू दौड़े खेतों में
मिट्ठू पिंजरे में होता

मिट्ठू के
बचपन का साथी
बैठा हुआ मुंडेर
रहा देखता मिट्ठू उसको
जाने कितनी देर

रोज रात को सपने में
मिट्ठू पेड़ों पर सोता

और एक दिन
मिट्ठू जब
बैठा था बहुत उदास
मिंकू को उसके दुक्खों का
हुआ तभी अहसास

पिंजरा खुला लगाए मिट्ठू
अब खुशियों का गोता

-प्रदीप शुक्ल


टिन्नी


टिन्नी के पापा टिन्नी को खूब खूब समझाएं
अंग्रेजी, विज्ञान, गणित की पुस्तक रोज पढ़ाएं

टिन्नी कहती, पापा मुझको कला बहुत है भाती
पल भर में ही कितने सारे सुन्दर चित्र बनाती

पापा कहते अच्छा है, पर अभी पढ़ो विज्ञान
मन मसोस कर रह जाती है नन्ही सी वह जान

जैसे तैसे पास किया उसने अपना स्कूल
अब विज्ञान गणित विषयों को जाना चाहे भूल

पापा चाहें इंजीनियरिंग कॉलेज पढ़ने जाए
टिन्नी को पर फाइन आर्ट्स का कॉलेज ही ललचाये

इसी बात पर टिन्नी के घर होती रोज लड़ाई
छोटी सी यह बात मगर पापा को समझ न आई

इंजीनियरिंग कॉलेज में टिन्नी अब दिन भर रोती
पापा से भी बातचीत टिन्नी की कम ही होती

फेल हो गई टिन्नी अब तो मन ही मन घबराए
तभी एक दिन पापा उसके कॉलेज चलकर आए

हाल देखकर टिन्नी का अब दुखी हुए हैं पापा
डांट पड़ेगी खूब सोचकर टिन्नी का मन कांपा

पर पापा ने बहुत प्यार से उसको गले लगाया
और उसी क्षण कॉलेज से बस उसका नाम कटाया

अब जो भी मन होगा उसका टिन्नी वही पढ़ेगी
अपने मन चाहे रंगों की दुनिया खूब गढ़ेगी ll

-प्रदीप शुक्ल

फ़रवरी में गुल्लू

जल्दी जगने लगे आजकल
दिन गुल्लू के गाँव में
और दोपहर में सुस्ताने लगे
नीम की छाँव में

बाहर निकल
किताबें अब तो
झांक रही हैं झोले से
गुल्लू भैया जान बूझ कर
बने हुए हैं भोले से

डर है चित ना हो जाएं वह
इम्तेहान के दाँव में

मैच आ रहा
है टीवी पर
मन उसमे ही डोल रहा
खुला हुआ पन्ना हिस्ट्री का
गुल्लू से कुछ बोल रहा

तारीखें सब युद्ध कर रही हैं
अब मारे ताव में

सोते ही
बजने लगती है
रोज घड़ी की घंटी
सर के ऊपर तनी हुई है
इम्तेहान की संटी

बेड पर गुल्लू बाबू बैठे
कम्बल डाले पाँव में

-प्रदीप शुक्ल

नाव, नदी और छुटकू


नदी किनारे गांव
गांव में छुटकू रहता है
छुटकू का मन वहीं नाव में
डोला करता है

उसका मन है
नदिया के संग
दूर देश जाऊं
रंग बिरंगी ढेर किताबें
लेकर मैं आऊँ

दिल की बातें अक्सर वह
पानी से कहता है

पढ़ने लिखने
से आएगा
उसको ज्यादा ज्ञान
और ज्ञान से बन पाएगा
वह बेहतर इंसान

दादू कहते
ज्ञान किताबों में ही बहता है

छुटकू की बातें
मछली को
लगतीं बहुत भली
उसे देखकर छोटी मछली
आती तुरत चली

सूरज भी पानी में
उसके संग संग चलता है

- प्रदीप शुक्ल

Sunday, 31 December 2017

भैयनलाल का अँगूँठा

मुँह में बार-बार दे लेते
भैयनलाल अँगूठा जी

अभी-अभी था मुंह से खींचा
था गीला तो साफ किया
पहले तो डाँटा था मां ने
फिर बोली जा माफ किया
अब बेटे मुँह में मत देना
गन्दा-गन्दा जूठा जी

चुलबुल नटखट भैयन को पर
मजा अँगूठे में आता
लाख निकालो मुँह से बाहर
फिर-फिर से भीतर जाता
झूठ मूठ गुस्सा हो मां ने
एक बार फिर खींचा जी

अब तो मचले, रोए भैयन
माँ ने की हुड़कातानी
रोका क्यों मस्ती करने से
क्यों रोका मनमानी से
रोकर बोले चखो अँगूठा
स्वाद शहद से मीठा जी

-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Friday, 28 October 2016

दीपावली का है त्योहार

सारंग सारांश चलो बाजार
दीपावली का है त्योहार
सजे हुए हैं हर घर द्वार
दीपों की हर ओर कतार
यह देखो बच्चों की फौज
करती फिरती कितनी मौज
चला हवाई छुटा अनार
चले पटाखे बारम्बार
डिंपल होकर के तल्लीन
सुलगाती माचिस रंगीन
फुलझड़ियों में रंग अनेक
मग्न हुआ बच्चा हर एक
लक्ष्मी जी से एक सवाल
करता हूँ मैं तो हर साल
धन की तो देवी है आप
ले सकती थीं आप जहाज
या ले लेतीं बढ़िया कार
उल्लू पर क्यों चढ़ती आप
उल्लू पर क्यों चढ़ती आप।।

-डा० संजय चतुर्वेदी
[दीपावली की बहुत सारी शुभकामनाएँ]

[डा० संजय चतुर्वेदी दिल्ली के शिक्षा विभाग में उप शिक्षा निदेशक (जोनल) हैं। बाल साहित्य पर उन्होंने पहली बार बाल कविता लिखी है। दीपावली पर लिखी डा० संजय जी की पहली बाल कविता का स्वागत करें।]