Thursday, 25 June 2015

गुल्लू का कम्प्यूटर

गुल्लू का कम्प्यूटर आया
पूरा गाँव देख मुस्काया

दादी के चेहरे पर लाली
ले आई पूजा की थाली

गुल्लू सबको बता रहा है
लाईट कनेक्शन सता रहा है

माउस लेकर छुटकू भागा
अभी अभी था नींद से जागा

अंकल ने सब तार लगाये
गुल्लू को कुछ समझ न आये

कंप्यूटर तो हो गया चालू
न ! स्क्रीन छुओ मत शालू

जिसे खोजना हो अब तुमको
गूगल में डालो तुम उसको

कक्का कहें चबाकर लईय्या
मेरी भैंस खोज दो भैय्या

बड़े जोर का लगा ठहाका
खिसियाये से बैठे काका

-डॉ. प्रदीप शुक्ल

Thursday, 16 October 2014

तितली

-निरंकार देव सेवक

दूर देश से आई तितली
चंचल पंख हिलाती
फूल-फूल पर
कली-कली पर
इतराती-इठलाती


यह सुन्दर फूलों की रानी
धुन की मस्त दीवानी
हरे-भरे उपवन में आई
करने को मनमानी

कितने सुन्दर पर हैं इसके
जगमग रंग-रंगीले
लाल, हरे, बैंजनी, वसन्ती
काले, नीले, पीले

कहाँ-कहाँ से फूलों के रंग
चुरा-चुरा कर लाई
आते ही इसने उपवन में
कैसी धूम मचाई

डाल-डाल पर, पात-पात पर
यह उड़ती फिरती है,
कभी ख़ूब ऊँची चढ़ जाती है
फिर नीचे गिरती है

कभी फूल के रस-पराग पर
रुककर जी बहलाती
कभी कली पर बैठ न जाने
गुप-चुप क्या कह जाती

-निरंकार देव सेवक 

Tuesday, 31 July 2012

एक सवाल



-ठाकुर श्रीनाथ सिंह
आओपूछें एक सवाल
मेरे सिर में कितने बाल ?

कितने आसमान में तारे ?
बतलाओ या कह दो हारे

चिड़ियाँ क्या करती हैं बात ?

नदिया क्यों बहती दिन रात ?

क्यों कुत्ता बिल्ली पर धाए ?
बिल्ली क्यों चूहे को खाए ?


फूल कहाँ से पाते रंग ?
रहते क्यों न जीव सब संग ?


बादल क्यों बरसाते पानी ?
लड़के क्यों करते शैतानी ?


नानी की क्यों सिकुड़ी खाल ?
अजीन ऐसा करो सवाल


यह सब ईश्वर की है माया
इसको कौन जान है पाया !



तिल्ली सिंह


-रामनरेश त्रिपाठी



पहने धोती कुरता झिल्ली
गमछे से लटकाये किल्ली
कस कर अपनी घोड़ी लिल्ली
तिल्ली सिंह जा पहुँचे दिल्ली
पहले मिले शेख जी चिल्ली
उनकी बहुत उड़ाई खिल्ली
चिल्ली ने पाली थी बिल्ली
बिल्ली थी दुमकटी चिबिल्ली
उसने धर दबोच दी बिल्ली
मरी देख कर अपनी बिल्ली
गुस्से से झुँझलाया चिल्ली
लेकर लाठी एक गठिल्ली
उसे मारने दौड़ा चिल्ली
लाठी देख डर गया तिल्ली
तुरत हो गयी धोती ढिल्ली
कस कर झटपट घोड़ी लिल्ली
तिल्ली सिंह ने छोड़ी दिल्ली
हल्ला हुआ गली दर गल्ली
तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली!


-रामनरेश त्रिपाठी
(1889 - 9162)

घूम हाथी, झूम हाथी


-विद्याभूषण 'विभु`

घूम हाथीझूम हाथी
घूम हाथीझूम हाथी
घूम हाथीझूम हाथी
हाथी झूम झूम झूम
हाथी घूम घूम घूम

राजा झूमें रानी झूमें
झूमें राजकुमार
घोड़े झूमें फौजें झूमें
झूमें सब दरबार
झूम झूम घूम हाथी
घूम झूम झूम हाथी
हाथी झूम झूम झूम
हाथी घूम घूम घूम

राज महल में बाँदी झूमे,
पनघट पर पनिहारी
पीलवान का अंकुश झूमें
सोने की अम्बारी
झूम झूम घूम हाथी
घूम झूम झूम हाथी
हाथी झूम झूम झूम
हाथी घूम घूम घूम



-विद्याभूषण 'विभु`

(1892 - 1965)

नटखट हम, हां नटखट हम


-सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर`

नटखट हमहां नटखट हम !
नटखट हम हां नटखट हम,
करने निकले खटपट हम
आ गये लड़के आ गये हम,
बंदर देख लुभा गये हम
बंदर को बिचकावें हम,
बंदर दौड़ा भागे हम
बच गये लड़के बच गये हम,
नटखट हम हां नटखट हम !

बर्र का छत्ता पा गये हम,
बांस उठा कर आ गये हम
छत्ता लगे गिराने हम,
ऊधम लगे मचाने हम
छत्ता टूटा बर्र उड़े,
आ लड़कों पर टूट पड़े
झटपट हट कर छिप गये हम,
बच गये लड़के बच गये हम !

बिच्छू एक पकड़ लाये,
उसे छिपा कर ले आये
सबक जांचने भिड़े गुरू,
हमने नाटक किया शुरू
खोला बिच्छू चुपके से,
बैठे पीछे दुबके से
बच गये गुरु जी खिसके हम,
पिट गये लड़के बच गये हम !

बुढ़िया निकली पहुँचे हम,
लगे चिढ़ाने जम जम जम
बुढ़िया खीझे डरे न हम,
ऊधम करना करें न कम
बुढ़िया आई नाकों दम,
लगी पीटने धम धम धम
जान बचा कर भागे हम,
पिट गये लड़के बच गये हम!



-सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर`
(1902 - 1980)

बादल


-सन्तोष कुमार सिंह
रोज निहारूँ नभ में तुझको,
काले बादल भैया।
गरमी से सब प्राणी व्याकुल,
रँभा रही घर गैया।।

पारे जैसा गिरे रोज ही,
भू के अन्दर पानी।
ताल-तलैया पोखर सूखे,
बता रही थी नानी।।

तापमान छू रहा आसमां,
प्राणी व्याकुल भू के।
बिजली खेले आँख मिचोली,
झुलस रहे तन लू से।।

जल का दोहन बढ़ा नित्य है,
कूँए सूख गए हैं।
तुम भी छुपकर बैठे बादल,
लगता रूठ गए हैं।।

गुस्सा त्यागो, कहना मानो,
नभ में अब छा जाओ।
प्यासी नदियाँ भरें लबालव,
इतना जल बरसाओ।।

छप-छप, छप-छप बच्चे नाचें,
अगर मेह बरसायें।
हर प्राणी का मन हुलसेगा,
देंगे तुम्हें दुआयें।।



-सन्तोष कुमार सिंह