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Friday, 1 June 2018

मेरा भी तो मन करता है


यहाँ सुने इस बाल कविता को एक बच्ची के स्वर में



मेरा भी तो मन करता है
मैं भी पढ़ने जाऊँ
अच्छे कपड़े पहन
पीठ पर बस्ता भी लटकाऊँ

क्यों अम्मा औरों के घर
झाडू-पोंछा करती है
बर्तन मलती, कपड़े धोती
पानी भी भरती है

अम्मा कहती रोज
‘बीनकर कूड़ा-कचरा लाओ’
लेकिन मेरा मन कहता है
‘अम्मा मुझे पढ़ाओ’

कल्लन कल बोला
बच्चू ! मत देखो ऐसे सपने
दूर बहुत है चाँद
हाथ हैं छोटे-छोटे अपने

लेकिन मैंने सुना
हमारे लिए बहुत कुछ आता
हमें नहीं मिलता
रस्ते में कोई चट कर जाता

डौली कहती है
बच्चों की बहुत किताबें छपती
सजी-धजी दूकानों में
शीशे के भीतर रहतीं

मिल पातीं यदि हमें किताबें
सुन्दर चित्रों वाली
फिर तो अपनी भी यूँ ही
होती कुछ बात निराली

   
-डा० जगदीश व्योम

Tuesday, 4 October 2016

है किस की तस्वीर

सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर ?

नंगा बदन, कमर पर धोती
और हाथ में लाठी
बूढ़ी आँखों पर है ऐनक
कसी हुई कद-काठी
लटक रही है बीच कमर पर
घड़ी बँधी जंजीर
सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर?

उनको चलता हुआ देखकर
आँधी शरमाती थी
उन्हें देखकर, अँग्रेजों की
नानी मर जाती थी
उनकी बात हुआ करती थी
पत्थर खुदी लकीर
सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर ?

वह आश्रम में बैठ
चलाता था पहरों तक तकली
दीनों और गरीबों का था
वह शुभचिंतक असली
मन का था वह बादशाह,
पर पहुँचा हुआ फकीर
सोचो और बताओ,
आखिर है किसकी तस्वीर?

सत्य अहिंसा के पालन में
पूरी उमर बिताई
सत्याग्रह कर करके
जिसने आजादी दिलवाई
सत्य बोलता रहा जनम भर
ऐसा था वह वीर
सोचो और बताओ,
आखिर है किसकी तस्वीर?

जो अपनी ही प्रिय बकरी का
दूध पिया करता था
लाठी, डंडे, बंदूकों से
जो न कभी डरता था
दो अक्टूबर के दिन
जिसने धारण किया शरीर
सोचो और बताओ,
आखिर है किसकी तस्वीर ?

-डा० जगदीश व्योम

Friday, 24 June 2011

मेरा भी तो मन करता है

- डा० जगदीश व्योम
मेरा भी तो मन करता है
मैं भी पढ़ने जाऊँ
अच्छे कपड़े पहन
पीठ पर बस्ता भी लटकाऊँ

क्यों अम्मा औरों के घर
झाडू-पोंछा करती है
बर्तन मलती, कपड़े धोती
पानी भी भरती है

अम्मा कहती रोज
`बीनकर कूड़ा-कचरा लाओ'
लेकिन मेरा मन कहता है
`अम्मा मुझे पढाओ'

कल्लन कल बोला-
बच्चू! मत देखो ऐसे सपने
दूर बहुत है चाँद
हाथ हैं छोटे-छोटे अपने

लेकिन मैंने सुना
हमारे लिए बहुत कुछ आता
हमें नहीं मिलता
रस्ते में कोई चट कर जाता

डौली कहती है
बच्चों की बहुत किताबें छपती
सजी- धजी दूकानों में
शीशे के भीतर रहतीं

मिल पातीं यदि हमें किताबें
सुन्दर चित्रों वाली
फिर तो अपनी भी यूँ ही
होती कुछ बात निराली।।

गिलहरी

- डा० जगदीश व्योम

गिलहरी दिन भर आती-जाती
फटे-पुराने कपड़े लत्ते
धागे और ताश के पत्ते
सुतली, कागज, रुई, मोंमियाँ
अगड़म-बगड़म लाती।
गिलहरी दिनभर आती-जाती।।

ठीक रसोईघर के पीछे
शीशे की खिड़की के नीचे
एस्किमो-सा गोल-गोल घर
चुन-चुन खूब बनाती।
गिलहरी दिनभर आती-जाती।।



दो बच्चे हैं छोटे-छोटे
ठीक अँगूठे जितने मोटे
बड़े प्यार से उन दोनों को
अपना दूध पिलाती।
गिलहरी दिनभर आती-जाती।।

खिड़की पर जब कौआ आता
बच्चे खाने को ललचाता
पूँछ उठाकर चिक्-चिक्-चिक्-चिक्
करके उसे डराती।
गिलहरी दिनभर आती-जाती।।

भोली-भाली बहुत लजीली
छोटी-सी प्यारी शरमीली
देर तलक शीशे से चिपकी
बच्चों से बतियाती।
गिलहरी दिनभर आती-जाती।।

Thursday, 23 June 2011

चिड़िया और बच्चे

-डॉ0 जगदीश व्योम


चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ
भूख लगी मैं  क्या खाऊँ ।

बरस रहा बाहर पानी
बादल करता मनमानी
निकलूँगी तो भीगूँगी 
नाक बजेगी सूँ सूँ  सूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ .......
  
माँ बादल कैसा होता ?
क्या काजल जैसा होता 
पानी कैसे ले जाता  है ?
फिर इसको बरसाता क्यूँ ?
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ ।
   
मुझको उड़ना सिखला दो
बाहर क्या है दिखला  दो
तुम घर में बैठा करना
उड़ूँ रात-दिन फर्रकफूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ ।
   
बाहर धरती बहुत बड़ी
घूम रही है चाक  चढ़ी
पंख निकलने दे पहले
फिर उड़ लेना जी भर तूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ ।
    
उड़ना तुझे सिखाऊँगी
बाहर  खूब  घुमाऊँगी
रात हो गई  लोरी गा दूँ
सो जा, बोल रही म्याऊँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ ।
भूख लगी मैं क्या खाऊँ ।।